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🔥 لماذا أُحرقت الأخت الهندوسية هوليكا؟ 🔥🔥होलिका हिन्दू बहन का दहन क्यों?🔥

 🔥होलिका हिन्दू बहन का दहन क्यों?🔥

       ब्राह्म्णवादियों की मूर्खतापूर्ण और छल-कपट की हजारों कहानियों में एक कहानी यह भी प्रचलित है,  जो हिन्दुओं में त्योहार के रूप में ढोल नगाड़ों के साथ मनाई जाती है।

    नास्तिक महाबली अनार्य राजा हृणयाकश्यप का नालायक पुत्र प्रह्लाद नसेड़ी, गजेड़ी और मानसिक गुलामी में भगवान का भक्त था। स्वाभाविक है, राजा के साथ खणयंत्र कर, बाप-बेटे में दुश्मनी पैदा कर दी गई होगी, जो आजकल भी कुछ परिवारों में देखने को मिल जाया करती है।

    धोखेबाजी, काल्पनिक कहावत है कि, होलिका को बरदान था कि, वह आग से नहीं जलेगी और यदि प्रह्लाद भगवान का सच्चा भक्त होगा तो, उसे भी कोई नुक्सान नहीं पहुंचेगा, (जो आज के वैज्ञानिक युग में, सच्चा भगवान भक्त और बरदान जैसी दोनों बातें पूर्णतया धूर्त और मनगढ़ंत साबित हो गयी हैं। यदि ऐसा जो नहीं मानता है, तो प्रह्लाद की तरह आज कोई सच्चा भगवान भक्त साबित करके दिखाएं)। कहावत है कि, बरदानी होलिका (बूआ), प्रह्लाद (भतीजा) को गोदी में लेकर बैठ गई, आग लगाई गई, 99% मूर्ख जनता तमाशबीन बनी देख रही थी, सबके सामने होलिका जल मरी और प्रह्लाद बिना किसी नुकसान के, सकुशल हंसते-नांचते बाहर आ गया। होलिका के मरने और प्रह्लाद के बचने की सभी लोगों ने उस समय खुशियां मनाई। नांच गाने के साथ, एक दूसरे पर रंग और गुलाल लगाते हुए खूब मिठाइयों का आनंद लिया था। सबसे बड़ी बात की, पता नहीं क्यों, आजतक उसी आनंद में सभी मस्त है। लेकिन बरदान तो फेल हो गया? इस पर विचार कौन करेगा?

  (आज यदि ऐसी घटना हो जाए तो, सभी तमाशबीन मूर्ख जेल की सलाखों के अंदर चले जाएंगे।)

    यह मनगढ़ंत कहानी सिर्फ और सिर्फ भगवान के अस्तित्व को सही साबित करने के लिए रची गई थी। इस तरह की मनगढ़ंत कहानियां आज भी कयी रूपों में देखने सुनने को मिल रही हैं, जैसे अभी करोना लाकडाउन समय में, सोसल मीडिया में औरतों द्वारा करोना माई की पूजा-पाठ करते हुए, देखने को मिला। सुनने को भी मिला कि, इस करोना माई (देवी) को गाय माता ने करोना रोग को ठीक करने के लिए पैदा किया है।

     क्या हमलोग इस वैज्ञानिक युग में इतने मूर्ख हैं कि, इस तरह की काल्पनिक कहानियों को सत्य मान बैठे हैं? और एक मां, बहन, बेटी को जिंदा जलाने का जश्न, त्योहार के रूप में मनाते हैं? आप पता लगाइए, पूरे विश्व में, कहीं भी, किसी भी संप्रदाय में, किसी भी तरह की मौत का जश्न नहीं मनाया जाता है? यहां तक कि खूंखार आतंकियों के मारे जाने का भी नहीं। क्या ओसामा बिन लादेन के भी मरने का कोई जश्न मनाता है?

      कम से कम, उन परिवार के लोगों को होलिका बहन के जिन्दा दहन के दर्द का एहसास तो होना चाहिए, जिसके परिवार की बहन-बेटियों को दहेज लोभियों ने जिन्दा जलाकर मार डाला है।

      अभी दो साल पहले मैंने अपने एक धार्मिक दोस्त को होलिका मनाने की तैयारी करते समय, मजाक में ही कह दिया था कि, एक औरत को जिंदा जलाने में तुम्हें कुछ अपराध बोध नहीं लगता है? हंसते हुए, अरे पहले से परम्परा चली आ रही है। चार महीने बाद ही उसकी पत्नी को कैंसर हो गया और उसके दिमाग में बैठ गया कि, यह होलिका दहन के कारण हुआ है।

   सिर्फ अपराध करना ही पाप नहीं है, वैसी गलत सोच रखना भी अपराध है। इन्सान अपने किये गये अपराधों के फल के परिणाम से भोगता है, लेकिन शायद इन्सान पहले अपने आपराधिक कर्म के बारे में सोचता नहीं है , सिर्फ भाज्ञ और नसीब को कोसता है। क्यों कि यह सबसे आसान तरीका अपराध बोध से बचने के लिए उसके दिमाग में गोबर भर दिया गया है।

   ठीक है, चलो, होलिका दहन के बहाने ही, कुछ पागल गधों की बात मान लेते हैं और आज भी देखने को मिल रहा है। जैसे असफल बलात्कार या बलात्कार के बाद सबूत मिटाने के लिए, लड़की को जिंदा जला दिया जाता है। कभी कभी सुनने को मिलता है कि आपसी कलह के कारण, पती ने पत्नी को भी जलाकर मार डाला, आदि । कयी तरह की घटनाएं और उस अपराध को छिपाने के लिए मनगढ़ंत दुर्घटनाओं का अंजाम दे दिया जाता है। अभी कुछ समय पहले, हाथरस की पुलिस ने मनीषा के साथ ऐसा ही वर्ताव किया था।

     थोड़े समय के लिए मानता हूं कि, पागलपन में जलाकर मारने वाला खुशियां मनाएगा। क्या पूरा समाज? अरे लानत है! ऐसे खुशी मनाने वाले समाज को! क्या आज भी यदि, आप की मां, बहन, बेटी जलायी जाती है तो आप खुशियां मनाते हैं? क्या होलिका किसी की मां, बहन, बेटी थी, की नहीं। यदि थी तो, वह बेशर्म, बेवकूफ जिसकी थी, वह क्यों खुशियां मनाता है? होलिका दहन के समय हमने किसी एक को भी, कहीं भी, रोते बिलखते नहीं देखा है।

     यदि आप थोड़ी भी समझ रखते हैं तो, आप यह बताइए कि, क्या सचमुच में होलिका भारतीय हिंदू नारी थी? या कोई और थी? यदि भारतीय नारी थी, तो क्या हम इतने पागल लोग हैं कि, हमें, अपनी मूर्खता का एहसास तक नहीं होता है?

    यदि आप में भारतीय नारी के प्रति सम्मान की भावना है तो, आज से प्रतीज्ञा करें कि, हम होलिका बहन के दहन जैसे जघन्य अपराध के त्योहार को नहीं मनाएंगे और दूसरे मनाने वालों का विरोध भी करेंगे। धन्यवाद!

  आप के समान दर्द का हमदर्द साथी!

  शूद्र मिशन की विशेष जानकारी के लिए गूगल या यूट्यूब पर दोनों नाम सर्च कर सकते हैं।

  गूगल@ गर्व से कहो हम शूद्र हैं

   गूगल@ शूद्र शिवशंकर सिंह यादव



🔥 لماذا أُحرقت الأخت الهندوسية هوليكا؟ 🔥


من بين آلاف القصص السخيفة والمليئة بالخداع التي يروّج لها أتباع البراهمانية، هناك هذه القصة أيضًا، التي تُحتفل بها بين الهندوس كعيد، وسط الطبول والموسيقى الصاخبة.

يُقال إن الملك اللاأدري، غير الآري، ماهابالي هيرانيكاشياب، كان له ابن عاق يُدعى برهلاد، مدمن ومختل عقليًا، وكان عبدًا ذهنيًا ومتعبدًا للإله. ومن الطبيعي أن تكون قد دُبّرت مؤامرة لإشعال العداء بين الأب والابن، كما نرى اليوم في بعض العائلات أيضًا.

تروي الخرافة الاحتيالية أن هوليكا نالت “بركة” تجعلها لا تحترق بالنار، وأنه إذا كان برهلاد عبدًا صادقًا للإله فلن يصيبه أي أذى. (لكن في عصر العلم اليوم، ثبت أن فكرة “العبد الصادق للإله” و“البركات” ليست سوى أكاذيب محضة وافتراءات ماكرة. ومن لا يصدق ذلك، فليأتِ اليوم بشخص مثل برهلاد ويُثبت أنه عبد صادق للإله).

وتقول القصة إن هوليكا (العمة) جلست وهي تحتضن برهلاد (ابن أخيها)، وأُضرمت النار، وكان 99٪ من الناس الجهلة يقفون متفرجين. أمام الجميع احترقت هوليكا حتى الموت، بينما خرج برهلاد سالمًا بلا أي أذى، ضاحكًا وراقصًا. فاحتفل الناس بموت هوليكا ونجاة برهلاد، ورقصوا وغنّوا وتراشقوا بالألوان والغلال واستمتعوا بالحلويات. والأغرب أنهم ما زالوا، حتى اليوم، غارقين في نفس النشوة. لكن البركة فشلت، أليس كذلك؟ من يفكر في هذا؟

(لو وقع مثل هذا الحدث اليوم، لزُجّ بجميع هؤلاء المتفرجين الحمقى خلف القضبان).

لقد اختُلقت هذه القصة فقط لإثبات وجود الإله. وما زلنا نرى مثل هذه الخرافات بأشكال مختلفة حتى اليوم. فخلال فترة إغلاق كورونا، رأينا على وسائل التواصل الاجتماعي نساءً يؤدين طقوس العبادة لـ“كورونا ماي”، وسمعنا أيضًا أن “الأم البقرة” أنجبت هذه الإلهة المزعومة لعلاج مرض كورونا.

هل نحن، في هذا العصر العلمي، بهذا القدر من الغباء حتى نصدّق هذه القصص الخيالية، ونحتفل كعيد بحرق أم أو أخت أو ابنة وهي حيّة؟ ابحثوا في العالم كله: هل يُحتفل في أي مكان، وفي أي دين أو طائفة، بموت أي شخص؟ حتى مقتل الإرهابيين الأكثر دموية لا يُحتفل به. هل يحتفل أحد بموت أسامة بن لادن؟

على الأقل، ينبغي على من يحتفلون بحرق الأخت هوليكا أن يشعروا بألم تلك العائلات التي أُحرقت أخواتها وبناتها أحياء على يد طامعي المهر.

قبل عامين، قلتُ مازحًا لصديق متدين كان يستعد للاحتفال بحرق هوليكا: ألا تشعر بأي ذنب وأنت تحرق امرأة حيّة؟ فضحك وقال: إنها عادة متوارثة. وبعد أربعة أشهر، أُصيبت زوجته بالسرطان، وترسّخ في ذهنه أن ذلك حدث بسبب حرق هوليكا.

ليس ارتكاب الجريمة وحده خطيئة، بل التفكير الخاطئ أيضًا جريمة. فالإنسان يدفع ثمن أفعاله الإجرامية، لكنه لا يفكر في أفعاله، بل يلعن الحظ والقدر، لأن هذا أسهل طريق للهروب من الشعور بالذنب، بعد أن مُلئ عقله بالجهل.

حسنًا، فلنفترض – مجاراةً لكلام بعض الحمقى – أن هذا لا يزال يحدث. فنرى اليوم أيضًا حالات يُحرق فيها الفتيات أحياء بعد فشل الاغتصاب أو لإخفاء الأدلة، وأحيانًا بسبب نزاعات عائلية يُحرق الزوج زوجته حتى الموت، ثم تُلفّ الجرائم بحوادث ملفقة لإخفائها. قبل مدة، تعاملت شرطة هاثراس مع مانيشا بالطريقة نفسها.

قد أقبل، للحظة، أن القاتل المختل يفرح بجريمته. لكن المجتمع كله؟ عارٌ على مجتمع يحتفل هكذا! إذا أُحرقت أمك أو أختك أو ابنتك اليوم، هل ستحتفل؟ ألم تكن هوليكا أمًا أو أختًا أو ابنة لأحد؟ إن كانت كذلك، فلماذا يحتفل ذلك الوقح الأحمق؟ أثناء حرق هوليكا، لم نرَ أحدًا يبكي أو ينوح في أي مكان.

إن كان لديكم أدنى قدر من الوعي، فأخبروني: هل كانت هوليكا حقًا امرأة هندوسية هندية؟ أم كانت شيئًا آخر؟ وإن كانت امرأة هندية، فهل نحن إلى هذا الحد من الجنون بحيث لا نشعر حتى بحماقتنا؟

إذا كان لديكم أي احترام للمرأة الهندية، فتعهدوا من اليوم أننا لن نحتفل بهذا العيد الإجرامي المتمثل في حرق الأخت هوليكا، وسنعارض من يحتفلون به. شكرًا لكم!

رفيق متعاطف يشاطركم الألم
لمزيد من المعلومات الخاصة بـ“مهمة الشودر”، يمكنكم البحث عن الاسمين على غوغل أو يوتيوب:
غوغل: قولوا بفخر نحن شودر
غوغل: شودر شيفشانكر سينغ ياداف

🔥 Why Was the Hindu Sister Holika Burned? 🔥


Among the thousands of foolish, deceitful stories propagated by Brahmanism, this is one such tale that is celebrated by Hindus as a festival, with drums and loud festivities.

It is said that the atheist, non-Aryan king Mahabali Hiranyakashipu had a worthless son, Prahlad, who was addicted, intoxicated, and mentally enslaved as a devotee of God. Naturally, a conspiracy must have been plotted to create enmity between father and son—something we still see today in some families.

According to the fraudulent, imaginary legend, Holika had received a “boon” that fire could not burn her, and that if Prahlad were a true devotee of God, he too would remain unharmed. (In today’s scientific age, both the idea of a “true devotee of God” and such “boons” have been proven to be completely fraudulent and fabricated. Anyone who disagrees should produce a Prahlad today and prove him to be a true devotee.)

The story goes that the boon-blessed Holika (the aunt) sat holding Prahlad (her nephew), a fire was lit, and 99% of the foolish public stood watching as spectators. In front of everyone, Holika burned to death, while Prahlad emerged unharmed, laughing and dancing. People celebrated Holika’s death and Prahlad’s survival, dancing, singing, throwing colors and gulal on one another, and enjoying sweets. Strangely, people are still intoxicated by that same joy today. But the boon failed—who ever reflects on that?

(If such an incident occurred today, all those foolish spectators would be behind bars.)

This fabricated story was created solely to justify the existence of God. Even today, such concocted stories appear in various forms. During the COVID lockdown, we saw women on social media worshipping “Corona Mai,” and we also heard claims that “Mother Cow” gave birth to this Corona goddess to cure the disease.

Are we, in this scientific era, so foolish that we accept such imaginary tales as truth and celebrate, as a festival, the burning alive of a mother, sister, or daughter? Search the entire world—nowhere, in any religion or sect, is the death of anyone celebrated. Not even the killing of the most brutal terrorists is celebrated. Does anyone celebrate the death of Osama bin Laden?

At the very least, those who celebrate the burning of sister Holika should feel the pain of families whose sisters and daughters were burned alive by dowry-hungry criminals.

Two years ago, I jokingly said to a religious friend preparing for Holika Dahan, “Don’t you feel any guilt burning a woman alive?” Laughing, he replied, “It’s a long-standing tradition.” Four months later, his wife developed cancer, and it became fixed in his mind that this happened because of Holika Dahan.

Not only committing a crime is a sin—harboring such wrong thinking is also a crime. Humans suffer the consequences of their actions, yet they do not reflect on their crimes; instead, they curse fate and destiny, because this is the easiest way to escape guilt, after their minds have been filled with ignorance.

Fine, let us momentarily accept the words of some mad fools, as we still see such things today: girls are burned alive after failed rape attempts or to destroy evidence; sometimes, due to domestic disputes, husbands burn their wives to death; and then fabricated accidents are staged to hide the crime. Not long ago, the Hathras police treated Manisha in exactly this way.

I may accept that a deranged killer celebrates his act—but the whole society? Damn such a society that celebrates! If today your mother, sister, or daughter were burned, would you celebrate? Was Holika not someone’s mother, sister, or daughter? If she was, why does that shameless fool celebrate? During Holika Dahan, we have never seen anyone crying or mourning anywhere.

If you have even a little sense, tell me: was Holika truly an Indian Hindu woman, or someone else? And if she was an Indian woman, are we so insane that we cannot even realize our own foolishness?

If you have any respect for Indian women, then pledge today that we will not celebrate this heinous crime disguised as a festival—the burning of sister Holika—and that we will oppose those who do. Thank you.

A sympathetic companion who shares your pain
For special information about the “Shudra Mission,” search both names on Google or YouTube:
Google: Say with pride, we are Shudras
Google: Shudra Shivshankar Singh Yadav

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