أيها الجاهلون بالبرهمية، يا من تصفون الضابط إس إس بي باندي بـ"سينغهام"، هنا لم يكن الأمر سوى صفعة واحدة.شودرا شيفشانكار سينغ ياداف.
*ब्राह्मणवादी जाहिलो, SSP पांडे को सिंहम कहने वालो, यहां तो सिर्फ एक ही थप्पड़ था।🔥
पुरोहित को थप्पड़ मारने से, कानूनी व्यवस्था के उल्लंघन से ज्यादा ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर चोट पहुंची है।
मथुरा में एक शादी समारोह में कोरोना लॉकडाउन नियम का उल्लंघन करने वाले पुरोहित को डीएम द्वारा थप्पड़ मारे जाने पर ब्राह्मणवाद की दुनिया में मानो भूचाल आ गया है।
मैं मानता हूँ कि थप्पड़ मारना कानूनन उचित नहीं है, लेकिन आज के माहौल में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आम बात हो गई है। आए दिन गली, गांव और कस्बों के चौराहों पर इससे भी वीभत्स गैर कानूनी कार्रवाई पुलिस के द्वारा देखने को मिलती रहती है। सिर्फ यहां अंतर यह आ गया कि, एक यादव ने हाई प्रोफाइल शादी कराने वाले ब्राह्मण पुरोहित को थप्पड़ मारा है। यदि यही पर ब्राह्मण ने यादव को मारा होता तो कानून व्यवस्था दुरुस्त कराने के नाम पर सिंहम हीरो की तरह मीडिया में ब्राह्मण छा गया होता। गनीमत है यदि यही यादव किसी मुस्लिम की शादी में काजी को थप्पड़ मारा होता तो, वह भाजपा के लिए राज्यसभा का प्रबल दावेदार बन जाता। पता नहीं, इस देश को क्या हो गया है कि? छोटी-बड़ी घटनाओं पर भी जातीय रंग दे दिया जाता है।
यहां स्वाभाविक है और अनुभव से कह रहा हूँ, अधीनस्थ अधिकारियों के समझाने बुझाने की कोशिश के बाद असफल होने पर ही रात 11 बजे डीएम को कार्रवाई करनी पड़ी होगी। यह भी हो सकता है कि, रात 11 बजे लॉ एंड ऑर्डर का हवाला देते हुए, डीएम को उकसाया गया होगा, तभी थप्पड़ मारने की नौबत आई होगी, अन्यथा ऐसी घटना सामान्यतः बड़े अधिकारियों के द्वारा नहीं होती है।
इस घटना के बाद, ज्यादा हल्ला मचाने से अच्छा होता कि, सभी ब्राह्मण पुरोहित, यादवों की शादी विवाह और पूजा-पाठ करने-कराने का बहिष्कार कर देते तो, यादवों के होश ठिकाने लग जाते और अंधभक्त तो बेचारे कुंवारे रह जाते।
एक 2004 की घटना का जिक्र करना उचित समझता हूँ। हमारी मां का अंतिम संस्कार दसवां का कार्यक्रम हमारी इच्छाओं के विपरीत, हमारा छोटा भाई गांव में करवा रहा था। वहीं पर न मैंने पानी दिया, न बाल मुंडवाया।
न चाहते हुए भी, मैंने बड़े प्यार से पुरोहित को समझा दिया था कि, बिना किसी टोका-टाकी के पूरा कार्यक्रम करने के बाद, मुझसे अपनी मजदूरी ले लेना, उसमें कमी नहीं रहेगी और वह मान भी गया था। लेकिन आदतन बीच-बीच में उकसाता ही रहता था। एक जगह काम रोक दिया और कहा कि, यहां बिना पैसे के काम आगे नहीं बढ़ेगा। पैसा मिलेगा तो मैं, उसी पैसे से दूध मंगाऊंगा और गणपति को पिलाऊंगा।
अब क्या, गुस्सा आना स्वाभाविक था। हवाई चप्पल निकालते हुए, गाली-गलौज देते हुए दौड़ा, जब-तक दो-तीन लोग बीच-बचाव करते, चप्पलें जा लगीं। भाई को भी गाली-गलौज करते हुए कहा, जिंदा रहते इतना सम्मान और सेवा नहीं किया और मरने के बाद इतना बड़ा नाटक। इस पंडे को भगाओ और सब सामान घर ले चलो।
मुझे कुछ लोग उसी को दोष देते हुए, वहां से हटाकर घर ले आए। पंडा विधान पूरी कर, सभी सामग्री लेकर वापस चला गया।
मेरे दिमाग में आया कि आज यदि यह काम अधूरा छोड़ कर चला जाता तो दूसरों को सबक मिल जाता। लेकिन आश्चर्य देखिए, वहां पंडों ने कुछ भी इस दुर्व्यवहार का विरोध नहीं किया। इतना अपमानित होने पर भी सभी काम पूर्ण किया। क्या कोई दूसरी जाति ऐसा व्यवहार आपस में करती है? इसे ब्राह्मणों का अच्छा गुण कहिए या ब्राह्मणवादी व्यवस्था बनाए रखना उनकी मजबूरी है। धन्यवाद!
गूगल @ गर्व से कहो हम शूद्र है
आप के समान दर्द का हमदर्द साथी!
गूगल @ शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
أيها الجاهلون بالبرهمية، يا من تصفون الضابط إس إس بي باندي بـ"سينغهام"، هنا لم يكن الأمر سوى صفعة واحدة. 🔥
إن توجيه صفعة إلى كاهن براهمي لم يكن مجرد انتهاك للقانون، بل اعتُبر ضربة للنظام البرهمي نفسه.
في مدينة ماثورا، وبعد أن صفع مسؤول المنطقة (DM) كاهنًا براهميًا خالف قواعد الإغلاق الخاصة بجائحة كورونا أثناء إقامته مراسم زفاف، بدا وكأن زلزالًا قد ضرب أوساط المدافعين عن البرهمية.
أنا أقر بأن صفع شخص ما ليس تصرفًا صحيحًا من الناحية القانونية، لكن في الأجواء السائدة اليوم أصبحت مثل هذه الأساليب تُستخدم كثيرًا بحجة فرض النظام. فنشهد باستمرار، في شوارع القرى والبلدات، ممارسات من الشرطة أشد قسوة وأكثر مخالفة للقانون من هذه الحادثة. غير أن الفارق هنا هو أن رجلًا من طائفة الياداف صفع كاهنًا براهميًا كان يشرف على حفل زفاف لشخصيات مرموقة. ولو كان العكس هو الذي حدث، أي لو صفع براهمي شخصًا من الياداف، لاحتفت به وسائل الإعلام وقدّمته كبطل على غرار "سينغهام" بحجة فرض القانون. والأكثر من ذلك، لو أن هذا المسؤول كان قد صفع قاضيًا مسلمًا في حفل زفاف، لربما أصبح مرشحًا قويًا لحزب بهاراتيا جاناتا لعضوية مجلس الولايات (راجيا سابها). لا أدري ماذا أصاب هذا البلد حتى أصبحت حتى الحوادث الصغيرة تُصبغ بالألوان الطائفية والطبقية.
ومن واقع الخبرة، أقول إنه من الطبيعي أن يكون المسؤولون الأدنى قد حاولوا أولًا إقناع الكاهن دون جدوى، وعندها اضطر مسؤول المنطقة، في الساعة الحادية عشرة ليلًا، إلى التدخل. وربما يكون قد تعرض أيضًا للاستفزاز تحت ذريعة الحفاظ على الأمن والنظام، مما أدى إلى وقوع الصفعة. فمثل هذه التصرفات ليست معتادة عادة من كبار المسؤولين.
بعد هذه الحادثة، كان من الأفضل - بدلًا من كل هذه الضجة - أن يقاطع جميع الكهنة البراهمة إقامة مراسم الزواج والطقوس الدينية لعائلات الياداف، وعندها لعرف الياداف حجم المشكلة، بينما كان الأتباع العميان سيبقون عزابًا.
وأرى من المناسب أن أذكر حادثة وقعت معي عام 2004. فقد كان أخي الأصغر يقيم مراسم اليوم العاشر لوفاة والدتنا في القرية، خلافًا لرغبتي. ولم أشارك في الطقوس، فلم أقدم الماء ولم أحلق رأسي.
ورغم أنني لم أكن أرغب في ذلك، فقد تحدثت مع الكاهن بلطف وقلت له: أتمم المراسم كلها دون إثارة أي مشكلات، وبعد انتهائها سأعطيك أجرك كاملًا ولن أنقص منه شيئًا. وقد وافق، لكنه ظل، كعادته، يستفزني بين الحين والآخر. ثم توقف في إحدى المراحل وقال: "لن يستمر العمل هنا إلا بعد دفع المال، وعندما أحصل عليه سأشتري به الحليب وأقدمه للإله غانيشا."
وهنا كان من الطبيعي أن أغضب. خلعت نعلي واندفعت نحوه وأنا أصرخ وأشتم، وقبل أن يتمكن شخصان أو ثلاثة من التدخل، أصابته ضربات النعل. ثم وجهت الشتائم إلى أخي أيضًا، وقلت له: "لم تحترم أمنا ولم تخدمها وهي على قيد الحياة، أما الآن فتقيم كل هذا الاستعراض بعد وفاتها! اطرد هذا الكاهن وخذوا كل الأغراض إلى المنزل."
بعد ذلك، أبعدني بعض الحاضرين وأعادوني إلى البيت وهم يلومون الكاهن. أما هو فأكمل الطقوس كلها، ثم أخذ مستلزماته وغادر.
وقد خطر ببالي أنه لو كان قد ترك المراسم غير مكتملة في ذلك اليوم، لكان في ذلك درس للآخرين. لكن المثير للدهشة أن بقية الكهنة لم يعترضوا إطلاقًا على سوء المعاملة التي تعرض لها. فعلى الرغم من الإهانة التي لحقت به، أكمل جميع الأعمال حتى النهاية. فهل يمكن أن تتصرف أي جماعة أخرى مع أفرادها بهذه الطريقة؟ لا أدري إن كان ينبغي اعتبار ذلك من حسن أخلاق البراهمة، أم أنه نابع من اضطرارهم إلى الحفاظ على النظام البرهمي.
شكرًا لكم.
غوغل: "قولوا بفخر إننا من طبقة الشودرا".
رفيق يشارككم الألم نفسه!
غوغل: شودرا شيفشانكار سينغ ياداف.
ملاحظة: النص يعبر عن رأي كاتبه ويتناول قضايا الطبقات الاجتماعية (الطوائف/الكاست) في الهند، ويتضمن لغة جدلية وانتقادات حادة للبرهمية وبعض رجال الدين، ولا يمثل حقائق موضوعية أو موقفًا محايدًا.

ليست هناك تعليقات:
إرسال تعليق