المحكمة العليا المحتقرة (كوتها)، الأحذية، والآن الشتائم.. ما الذي يحدث ولماذا؟ الكاتب: بقلم: شودرا شيفشانكار سينغ ياداف
शीर्षक: सुप्रीप कोठा, जूता और अब गाली-गलौज, यह सब क्या और क्यों हो रहा है?
लेखक: लेखक: शूद्र शिवशंकर सिंह यादव मुंबई, महाराष्ट्र
उप-शीर्षक (बाएं): सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मनुवादी व्यवस्था पर करारी चोट
मुख्य पाठ :
ब्राह्मणी नूपुर शर्मा को पूरे देश से माफी मांगने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से भारतीय संविधान की अवहेलना नहीं, बल्कि मनुवादियों के मनुस्मृति संविधान का उल्लंघन हुआ है।
इस घटनाक्रम पर मुझे राहत इन्दौरी की ग़ज़ल का वह शे'र याद आ गया जो उन्होंने विभाजन और साम्प्रदायिकता पर चुप्पी मारने वाले लोगों को इंगित करते हुए कहा है — 'लगेगी आग तो आएंगे कई घर ज़द में, गली में सिर्फ हमारा मकान थोड़े है।' इन पंक्तियों ने ही मुझे इस लेख को लिखने को प्रेरित किया। सुप्रीम कोर्ट के सम्माननीय जज ने पैगंबर मोहम्मद के ऊपर अपमानजनक टिप्पणी करने वाली नूपुर शर्मा की दलील सुनने से इनकार करते हुए, देश-विदेश में माहौल खराब होने के लिए उसे जिम्मेदार ठहराते हुए, उसको फटकार लगाई और पूरे देश से माफी मांगने को कह दिया। अब क्या, कोर्ट द्वारा एक भाजपाई ब्राह्मणी को पूरे देश से माफी मांगने का आदेश देते ही, मनुवादियों द्वारा ऐसी प्रतिक्रिया हो रही है, मानो मनुवाद की जड़ में भूचाल आ गया है।
नाराजगी इतनी कि, देश के मान-सम्मान का भी ख्याल नहीं आया। सुप्रीम कोर्ट को ‘सुप्रीम कोठा’ लिखकर सोशल मीडिया में ट्रेन्ड चलाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के जज भी भौंचक हो गए हैं कि, ऐसे फैसले तो आए दिन देश के न्यायाधीश लोग देते ही रहते हैं। उन्हें भी समझ में नहीं आ रहा है कि जजमेंट देने में चूक कहां हो गई है? कहीं दूर लगी बस्ती की आग की चपेट में खुद आने पर समझ में तो आ गया है, तभी तो आज वे भारतीय संविधान की दुहाइयां दे रहे हैं।
मैं कहता हूँ जज साहब, यदि आप यही फरमान किसी शूद्र के लिए दिए होते तो, यही सुप्रीम कोठा ट्रेन्ड चलाने वाले आपकी तारीफ करते हुए, सोशल और नेशनल मीडिया पर सही न्याय देने वाले महान न्यायविद की उपाधि से नवाज देते। यही नहीं, नेशनल मीडिया पर डिबेट घंटों नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलती रहती।
यदि किसी मुस्लिम महिला के लिए यह निर्णय दिए होते, तो हो सकता है रिटायरमेंट के बाद भविष्य में राज्यसभा की सीट भी सुरक्षित हो जाती।
जज साहब, आप इतना जल्दी कैसे भूल गए कि, इसी सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के साथ-साथ लोगों की आस्था का भी ख्याल रखते हुए बाबरी मस्जिद केस में बिना पर्याप्त सबूत के मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था और जज साहब को सम्मानित भी किया गया था।
लेकिन यहां आप ने आस्था का ख्याल न रखते हुए, सिर्फ संविधान का पालन किया है और अनजाने में मनुस्मृति वाले ब्राह्मणी संविधान की अवहेलना हो गई है। यही चूक हुई है कि आप लोग जयपुर के हाईकोर्ट के प्रांगण में महान न्यायविद न्यायाधीश मनु महाराज की लगी मूर्ति को नज़रअंदाज करते आ रहे हैं। इसलिए कुछ लोगों को नागवार गुजरा है।
सोचा, याद दिला दूं कि पिछले साल कोरोनाकाल में संवैधानिक कानून का पालन करने वाले डीएम शैलेश यादव ने शादी कराने वाले एक ब्राह्मण पुरोहित को देर रात कानून का उल्लंघन करने पर, एक झापड़ जड़ दिया था, जो भारत में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आम बात होती है। उस समय भी ऐसा ही भूचाल आया था कि एक यादव ने ब्राह्मण को थप्पड़ जड़ दिया। उस समय भी ऐसा ही सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष में ट्रेन्ड चलाया गया था। लेकिन सभी जानते हैं कि वह यादव डीएम के खिलाफ चला था। यही डीएम यदि ब्राह्मण होता तो सिंघम बन जाता या इसी यादव डीएम ने किसी काजी को थप्पड़ जड़ा होता तो लोकसभा या विधानसभा का उसका टिकट कन्फर्म हो जाता।
आपको तो जानकारी होगी कि भारतीय इतिहास में एक ब्राह्मण को ब्रिटिश कानून के दायरे में के पहली बार फांसी की सजा दी गई तो, इन्हीं कोठा ट्रेन्ड चलाने वालों के पूर्वजों ने ब्रिटेन के खिलाफ अंग्रेजों भारत छोड़ो का आन्दोलन शुरू कर दिया था। अफसोस! आने वाले दिनों में आपके साथ भी ऐसा ही या अपमानित करने का व्यवहार किया जा सकता है।
दुःख आज इस बात का है कि 72 साल तक भारतीय संविधान लागू होने के बाद भी ऐसी असंवैधानिक घटनाएं क्यों हो रही हैं? इसका दोषी कौन है? आज सभी न्यायप्रिय नागरिकों और संवैधानिक कानून की रखवाली करने वाले महानुभावों को मंथन करने की जरूरत है।
العنوان الرئيسي: المحكمة العليا المحتقرة (كوتها)، الأحذية، والآن الشتائم.. ما الذي يحدث ولماذا؟
الكاتب: بقلم: شودرا شيفشانكار سينغ ياداف - مومباي، ماهاراشترا
العنوان الفرعي: قرار المحكمة العليا يوجه ضربة قاسية للنظام المانوية (الطبقي الهندوسي).
نص المقال:
إن أمر المحكمة العليا لـ "نوبور شارما" (البرهمية) بالاعتذار للبلاد بأسرها لا يُعد انتهاكاً للدستور الهندي، بل هو انتهاك لدستور "مانوسمريتي" الذي يتبعه المانويون (أنصار النظام الطبقي التقليدي).
هذا التتابع للأحداث ذكّرني ببيت شعر للشاعر راهت إندوري، والذي قاله مشيراً إلى أولئك الذين يلزمون الصمت تجاه الانقسام والطائفية: "إذا اشتعلت النار، فستطال بيوتاً كثيرة، فليس بيتنا وحده هو الموجود في الزقاق". هذه الأسطر هي ما ألهمتني لكتابة هذا المقال. لقد رفض قاضي المحكمة العليا الموقر الاستماع إلى دفوع نوبور شارما، التي أدلت بتصريحات مسيئة للنبي محمد (ص)، وحمّلها مسؤولية إفساد الأجواء داخل البلاد وخارجها، وقام بتوبيخها وأمرها بالاعتذار للأمة بأسرها. والآن، وبمجرد أن أمرت المحكمة امرأة برهمية من حزب بهاراتيا جاناتا (BJP) بالاعتذار، جاءت ردود أفعال المانويين وكأن زلزالاً قد ضرب جذور نظامهم.
لقد بلغ الغضب لديهم حداً جعلهم لا يراعون حتى كرامة الوطن وشرفه؛ حيث أطلقوا وسمًا (تريند) على وسائل التواصل الاجتماعي يصف المحكمة العليا بـ "المحكمة العليا المحتقرة" (Supriim Kotha). حتى قضاة المحكمة العليا أصيبوا بالذهول، فمثل هذه الأحكام يصدرها القضاة في البلاد بشكل يومي، ولم يفهموا أين أخطأوا في إصدار هذا الحكم. ولكن عندما طالتهم نيران تلك البلدة البعيدة، أدركوا الأمر، ولهذا السبب نراهم اليوم يتذرعون بالدستور الهندي.
أقول لك يا سيادة القاضي، لو أنك أصدرت هذا الأمر ضد شخص من طبقة "الشودرا" (الطبقة الدنيا)، لكان هؤلاء الذين يطلقون وسم "المحكمة المحتقرة" قد أشادوا بك، ووصفوك على وسائل الإعلام المحلية والوطنية بالفقيه العظيم الذي يحقق العدالة الحقة. ليس هذا فحسب، بل لاستمرت النقاشات على الشاشات الوطنية ليس لساعات، بل لأيام طويلة.
ولو كان هذا القرار قد صَدَر بحق امرأة مسلمة، لربما كان مقعدك في مجلس الشيوخ (راجيا سابها) مضموناً بعد التقاعد في المستقبل.
سيادة القاضي، كيف نسيت بهذه السرعة أن هذه المحكمة العليا نفسها، ومراعاةً منها لمشاعر وعقائد الناس إلى جانب الدستور، قد حكمت لصالح المعبد في قضية "مسجد بابري" دون وجود أدلة كافية، بل وتم تكريم القاضي حينها؟
لكنك هنا لم تراعِ العقيدة والمشاعر، بل اتبعت الدستور فقط، ودون قصد منك، تم انتهاك الدستور البرهمي (المانوسمريتي). هذا هو الخطأ الذي ارتكبتموه، فأنتم تتجاهلون تمثال "مانو महाराज" (واضع القوانين الطبقية القديمة) المنصوب في ساحة المحكمة العليا بجايبور، ولذلك شعر بعض الناس بالإهانة.
أردت فقط أن أذكرك بأنه في العام الماضي خلال فترة كورونا، قام مدير المنطقة (DM) شايليش ياداف، الذي كان يطبق القانون الدستوري، بصفع كاهن برهمي لمخالفته القانون في وقت متأخر من الليل أثناء إقامة حفل زفاف—وهو أمر معتاد للحفاظ على النظام والقانون في الهند. في ذلك الوقت أيضاً، ثارت ثائرة عارمة لأن رجلاً من عائلة "ياداف" صفع برهمياً! وانتشر وسم على وسائل التواصل الاجتماعي بين مؤيد ومعارض، لكن الجميع يعلم أن الهجوم تركز ضد مدير المنطقة ياداف. لو كان هذا المدير برهمياً لُقِّب بالبطل (سينغهام)، ولو كان قد صفع قاضياً مسلماً (كازي) لضمن تذكرته للبرلمان أو الجمعية التشريعية.
لعلك تعلم أنه في التاريخ الهندي، عندما حُكم على برهمي بالإعدام شنقاً لأول مرة تحت طائلة القانون البريطاني، قام أجداد هؤلاء الذين يطلقون وسم "المحكمة المحتقرة" ببدء حركة "ارحلوا يا إنجليز" ضد بريطانيا. للأسف! قد تواجه معاملة مماثلة أو مهينة في الأيام القادمة.
الأمر المحزن اليوم هو أنه بعد مرور 72 عاماً على تطبيق الدستور الهندي، لماذا لا تزال مثل هذه الحوادث غير الدستورية تقع؟ من المذنب في ذلك؟ اليوم، يحتاج جميع المواطنين المحبين للعدالة والشخصيات التي تحمي القانون الدستوري إلى التأمل والمراجعة الجادة.

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