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«إذا سقيت شجرة السنط، فمن أين ستجني الثمار؟»شودرا شيف شانكار سينغ ياداف

 🔥 الحلقة الحادية والخمسون – صباح 12-05-2020 🔥

«إذا سقيت شجرة السنط، فمن أين ستجني الثمار؟»
بتاريخ: 01-08-2019

منذ عدة أشهر، وخلال العديد من الاجتماعات، أخذت أشعر بأن الناشطين الاجتماعيين والقادة السياسيين لا يفعلون سوى تحميل الجماعات ذات التوجه «الزعفراني» (القومية الهندوسية) مسؤولية الوضع الكارثي الراهن. ففي خطاباتهم الطويلة يوردون مئات الأمثلة على الظلم والاستغلال، ويعددون أسماء كل الأمراض الاجتماعية، فيحصدون التصفيق والإعجاب ويشعرون بالرضا عن أنفسهم، لكنهم لا يقدمون أي اقتراح عملي ذي قيمة لمعالجة هذه الأوضاع.

ولا يزال بعضهم يكرر الشعارات القديمة نفسها، مثل: المطالب، والمسيرات، والاعتصامات، والمظاهرات، والإضرابات العامة... وهي وسائل أثبتت فشلها تماماً، ومن السذاجة أن نتوقع من هذا الحكم ذي التوجه الزعفراني أن يستجيب لها.

فممن تطلبون حقوقكم؟ ولماذا يعيد لكم أحد ما اغتصبه لمجرد أنكم طلبتموه؟ هل تظنون أنه إلى هذا الحد من السذاجة؟ أم أنكم أنتم الذين تواصلون خداع أنفسكم؟

عند اعتقال السيد أخيليش ياداف في سونبهادرا، ظهر الارتباك والغضب واضحين على وجهه، وهو يقول لشرطي بسيط: «كيف تجرؤون على معاملتي بهذه الطريقة؟».

وقبل ذلك بوقت، صدرت تعليقات ذات طابع «زعفراني» من قبيل: «لولا الدستور لكان أخيليش يرعى الجاموس في مزرعة أحد الإقطاعيين، أما الذين كانوا يجمعون روث الأبقار فقد أصبحوا يتنقلون اليوم في سيارات تبلغ قيمتها خمسة كرور روبية.»

ثم تساءل أخيليش أمام الصحفيين: «إذا كانوا يعاملونني بهذه الطريقة، فما الذي يمكن أن يفعلوه مع عامة الناس؟ وما الذي يفكرون فيه تجاههم؟»

أما نحن، فلا يغير ذلك كثيراً في حياتنا، لأننا - نحن الشودرا - اعتدنا الإهانة منذ طفولتنا. لكنني أشعر تماماً بالألم الذي أصابك.

فأنت ابن رجل محترم، ورئيس حزب ساماجوادي، ورئيس وزراء سابق للولاية، ومن الطبيعي أن يكون هذا الإذلال العلني مؤلماً لك. لكنه ليس إهانة لك وحدك، بل هو أيضاً إهانة للدستور، وإهانة لجميع إخوتنا من طبقة الشودرا.

ولكن لماذا يحدث هذا بعد سبعين عاماً من الاستقلال؟ وليس الأمر مقتصراً على حادثة سونبهادرا، بل هناك أيضاً جرائم بشعة مثل قضية أوناو التي أخجلت البلاد بأسرها، ومع ذلك لا يبدو أن الإدارة تكترث، بل إن اضطهاد الـ15% للـ85% يزداد يوماً بعد يوم، رغم أننا نعيش في نظام ديمقراطي. ومن الصعب تصور حدوث مثل هذا الأمر في أي دولة ديمقراطية أخرى.

ولمعرفة السبب الحقيقي، لا بد من العودة إلى الماضي قليلاً.

إن التنافس بين الشودرا والبراهمة، وما ترتب عليه من فعل ورد فعل، ربما بدأ منذ سقوط العصر البوذي. لكن أشد ردود الفعل من جانب البراهمة بدأت خلال الحكم البريطاني. وما إن أدركوا أن الانتخابات والديمقراطية ستصبحان واقعاً، حتى تخلوا عام 1905 عن «الديانة البراهمية» و«الجمعية البراهمية»، وأسسوا ما سموه «الديانة الهندوسية» و«الهندوس ماهاسابها» (وهو اسم يقول الكاتب إن أصله كان لقباً أطلقه المغول).

وكانت روح التآمر، بحسب الكاتب، جزءاً من تكوينهم منذ البداية، بينما كان الشودرا ساذجين، وجهلاء، ويؤمنون إيماناً أعمى بالحظ، والآلهة، و«الغورو» (أي الكاهن البراهمي). فأخافوهم أولاً من الإنجليز، ثم من المسلمين، ونجحوا في تضليلهم وتحويلهم إلى «هندوس»، وما زالت هذه العملية مستمرة حتى اليوم.

إن شجرة البراهمانية أو «المانوفادية» التي زُرعت عام 1905، من الذي ظل يرويها حتى أصبحت مثمرة؟ هل البراهمة وحدهم؟

فكروا في الأمر.

إن 3% فقط من البراهمة، ومنذ ما يقرب من 115 عاماً، يعملون بلا انقطاع، وتحت غطاء الديانة الهندوسية، بهدف واحد ورسالة واحدة، هي ترسيخ هيمنة البراهمانية.

وفي المقابل، ينشغل 85% من الشودرا، ليل نهار، بتمجيد طوائفهم وأنسابهم وعشائرهم.

وبذلك فإنهم يضعفون أنفسهم بأيديهم.

والمؤسف أن الشودرا يضربون أنفسهم بالفأس، ويقدمون، عن طيب خاطر، الغذاء والماء لجذور البراهمانية. ثم عندما تأتي النتائج عكس ما يريدون، لا يلومون أنفسهم، بل يلعنون البراهمانية.

وهنا تنطبق الحكمة القائلة:

«كما تزرع تحصد.»

السيد أخيليش، يؤسفني أن أقول إن لعائلتكم دوراً مهماً في تغذية جذور البراهمانية، حتى أصبحت مصدر قوة للبراهمة، ومصدر شقاء لكم.

إذا كنتم تريدون حكم هذا البلد وإدارته، كما تريدون الثأر لإهانة الدستور، فإن لدي اقتراحاً بسيطاً:

توقفوا عن تغذية البراهمانية.

أي:

أوقفوا جميع الطقوس التي فرضها البراهمة، وادعوا إلى مقاطعة جميع الأعياد والمناسبات، والآلهة المزعومة، والربوبيات المتخيلة التي أوجدوها.

وادعوا جميع وسائل الإعلام الوطنية والاجتماعية إلى مؤتمر صحفي، وأعلنوا فيه:

«اعتباراً من اليوم، أنا لست هندوسياً.
شري كريشنا ليس إلهاً، بل هو بطل عظيم من أسلافنا.
وأنا فخور بأنني وُلدت في طبقة الشودرا.
والدستور هو كتابي المقدس،
والدكتور بابا صاحب (بي. آر. أمبيدكار) هو مرشدي الديني.»

وبعد ذلك، انتبهوا جيداً، وزيدوا الحراسة حتى على الباب الخلفي لمنزلكم ليلاً، لأن كثيراً من الشخصيات الزعفرانية البارزة سيحاولون الدخول إليكم متوسلين وراكعين أمامكم. لكن هذه المرة، كونوا ثابتين ولا تقبلوا أي وساطة.

«قولوا بفخر: نحن شودرا.»
«منصة وحدة الشودرا.»

رفيقكم الذي يشارككم الألم،

شودرا شيف شانكار سينغ ياداف

الهاتف: W-7756816035

ملاحظة:
نُشر هذا المقال في كتابنا «البديل عن البراهمانية هو الشودرية»، كما نُشر مقال آخر في كتاب «قولوا بفخر: نحن شودرا».

رسالة مفتوحة إلى السيد أخيليش ياداف

حضرة السيد أخيليش ياداف المحترم،

مع فائق الاحترام، أود أن أسألك أيضاً:

لماذا تعتبر نفسك أدنى من البراهمي؟ وإلى متى ستظل كذلك؟



🔥51वां एपिसोड,सुबह,दिनांक 12-05-2020🔥

🔥सींचा पेड़ बबूल का, फल कहां से होय।🔥 

                            दिनांक 01-08-2019

    कुछ महीनो से, कई मीटिंगो से, मुझे यह एहसास हो रहा है कि, आज की भयावह स्थिति के लिए सामाजिक कार्यकर्ता या राजनीतिक नेता, भगवा मंडली को सिर्फ दोष देते रहते है। अपने लम्बे लम्बे भाषणो मे, सैकड़ो उदाहरण देते हुए अत्याचार और शोषण रूपी बिमारियो के नाम गिना डालते है और तारीफ मे तालियां भी बटोर लेते है और आत्ममुग्ध भी हो जाते है। लेकिन वही निदान के बारे मे कोई सार्थक सुझाव नही दे पाते है। कुछ लोग पहले की रटी -रटाई बाते ही कहते आ रहे है। जैसे डिमांड, मोर्चा, धरना, प्रदर्शन, बन्द आदि,जो टोटली फेल होते आया है और इस भगवा शासन से उम्मीद करना बेवकूफ़ी है। 

   अरे, किससे मांग रहे हो? और हड़पी हुई चीज, आप को मांगने से वापस क्यो, कोई करेगा? क्या उसे आप इतना मूर्ख समझते है? या खुद आप मूर्ख बनते चले आ रहे  है। 

   सोनभद्र मे गिरफ्तारी के समय माननीय अखिलेश यादव जी के चेहरे पर बौखलाहट,अदना पुलिस वाले से कहते हुए,  मेरे साथ आप ऐसा सलूक कैसे कर सकते है? तथा कुछ समय पहले की भगवामयी टिप्पणिया जैसे, संविधान नही होता तो अखिलेश किसी जमींदार के यहां भैस चराते, गोबर के कंडे बिनने वाले आज पांच करोड़ की गाड़ी मे घूम रहे है। अखिलेश जी का यह सवाल पत्रकारो से पूछना कि जब मेरे साथ ऐसा ब्यवहार हो रहा है तो आम जनता के बारे मे, ए क्या सोच रखते होंगे? 

   हमे तो ज्यादा कुछ फर्क नही पड़ता, क्योंकि हम शूद्र लोग तो बचपन से ही अपमान का  अनुभव करते आ रहे है,  लेकिन मै आप के दर्द को बखूबी महसूस कर रहा हूं। 

    सम्मानित बाप का होनहार बेटा, समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष और पूर्व मुख्य मंत्री जैसी हस्ती का इस तरह,  इतना बड़ा अपमान, चेहरे पर बौखलाहट भरा दर्द स्वाभाविक है। यह अपमान सिर्फ अखिलेश यादव जी का नही, संविधान के अपमान के साथ साथ सभी शूद्र भाइयो का भी अपमान है।

  आखिर 70 सालो बाद ऐसा क्यो हो रहा है? सोनभद्र कान्ड ही नही उन्नाव जैसे घृणित काम, जिससे पूरा देश शर्मसार हो गया है। लेकिन प्रशासन को कोई फर्क नही  दिखाई पड़ता है  और वह भी लोकतंत्र मे  15% वालों का, 85% वालो  पर अत्याचार और उत्पीड़न लगातार बढ़ता जा रहा है। लोकतांत्रिक किसी भी दूसरे देश मे ऐसा सम्भव नही है। 

    सही कारण जानने के लिए कुछ अतीत मे जाना पडे़गा। शूद्र और ब्राह्मण की प्रतिद्वंद्विता, उसकी  क्रिया और प्रतिक्रिया, शायद बौद्ध काल  के पतन से ही चालू है। लेकिन ब्राह्मणो द्वारा सबसे तीव्र प्रतिक्रिया अंग्रेजो के शासन काल मे शुरू हुआ। ज्योंही इनको चुनाव के द्वारा जनतांत्रिक प्रक्रिया की भनक लगी, त्योही 1905 मे ही इन्होंने ब्राह्मण धर्म और ब्राह्मण सभा का परित्याग कर हिन्दू धर्म और हिन्दू महासभा  (मुगलो की दी हुई गाली) बना ली। खणयंत्र तो इनके DNA मे पहले से था और वही शूद्र अबोध, अज्ञान, भाग्य- भगवान और गुरू (ब्राह्मण) पर अन्धभक्ति मे विश्वास करने वाला था। पहले अंग्रेजो का, बाद मे मुसलमानो का डर दिखा कर शूद्रो को भी गुमराह कर हिन्दू बनाने मे लग गये, जो आजतक जारी है।

   ब्राह्मणवाद या मनुवाद का पौधा जो  सन् 1905 मे लगाया गया था,  उसे फलदायी बनाने मे  खाद पानी देने का काम आज तक कौन कर रहा है? क्या सिर्फ ब्राह्मण कर रहा है? 

   सोचिए, समझिए 3% ब्राह्मण करीब करीब 115 साल से  लगातार, हिन्दू धर्म की आड़ लेकर , सतत प्रयास करते हुए, एक ही लक्ष्य और एक ही मिशन ब्राह्मणवाद के महत्व को बनाने मे लगे हुए है और वही 85% शूद्र अपनी-अपनी जाति और गौत्र को महिमा मंडन करने मे रात-दिन लगे हुए है। 

     ऐसा करते हुए  अपने-आप को ही कमजोर बना रहे है। दुर्भाग्य यह है कि शूद्र, खुद अपने ही पैरो पर कुल्हाड़ी मारते हुए, ब्राह्मणवाद की जड़ मे खुशी खुशी खाद पानी दे रहा है।  विपरीत परिणाम मिलने पर अपना दोष न देते हुए, ब्राह्मणवाद को कोसने लगता है। यहा यह कहावत भी चरितार्थ होती दिखती है। 

  जैसी करनी वैसी भरनी 

    अखिलेश जी अफसोस  के साथ कहना पड रहा है कि ब्राह्मणवाद की जड़ मे खाद -पानी देकर, ब्राह्मणो के लिए फलदायी तथा खुद के लिए आज दुखदायी बनाने मे  आप के परिवार की अहम भूमिका रही है। 

    यदि आप इस देश पर शासन प्रशासन करना, और संविधान के  अपमान का बदला भी लेना चाहते है तो, सिर्फ मेरा एक छोटा सा सरल सुझाव है कि- ब्राह्मणवाद को खुराक देना बन्द कर दे। यानी ---

   ब्राह्मणो द्वारा प्रतिस्थापित सभी कर्मकांड बन्द करे और  उनके द्वारा पैदा किए गए सभी तीज -त्योहार, नकली देवी देवता और काल्पनिक भगवानो का बहिष्कार करने का आह्वान करे।  सभी राष्ट्रीय या सोशल मीडिया को बुलाकर, प्रेष कांफ्रेंस मे, यह डिक्लेयर करे कि - 

 मै आज से  हिन्दू नही हूं। श्रीकृष्ण, भगवान नही, हमारे बंशज के नायक महापुरुष है और मुझे गर्व है कि मै शूद्र वर्ण मे पैदा हुआ हूं। संविधान ही मेरी धार्मिक पुस्तक है और विश्व विख्यात बाबा साहब  मेरे धर्म गुरु है। 

    इसके बाद, ध्यान रहे रात को बंगले के पिछले दरवाजे पर भी पहरेदारी बढ़ा दीजिएगा, कई महान भगवा हस्तियां आपके सामने घुटने टेकने के लिए गिड़गिड़ाते हुए घुसने की कोशिश करेगी। लेकिन ध्यान रहे, इस बार अडिग तो, अडिग, किसी की भी सिफारिश नहीं।

"गर्व से कहो हम शूद्र हैं" "शूद्र एकता मंच"

  आप का समान दर्द का हमदर्द साथी,

 शूद्र शिवशंकर सिंह यादव 

 मो0- W-7756816035


(नोट - यह लेख हमारी लिखित पुस्तक "ब्राह्मणवाद का विकल्प शूद्रवाद" में प्रकाशित हुआ है और एक दूसरा लेख दूसरी पुस्तक  *गर्व से कहो हम शूद्र हैं, में प्रकाशित हुआ है।

    अखिलेश यादव जी को खुला पत्र 

  माननीय श्री अखिलेश यादव जी!

     सविनय निवेदन के साथ, मैं आप से भी जानना चाहता हूं कि आप खुद ब्राह्मण से नींच क्यों हैं? और कब तक बने रहेंगे?)

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